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सुपन्यू देखी छयो जू पूरू ह्वैगे / ओम बधानी
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सुपन्यू देखी छयो जू पूरू ह्वैगे
आस कै छै जैकी, उ मेरू ह्वैगे
मन बोळ्नू छ उडणौ, नचणौ छमा छम्म
जग्वाळ मेरी पाठ पड़िगे
सजायूं सुपन्यू सच्चू ह्वैगे
मै मन्दिरू मण्डुलौं जायां कु परचू पैगे
आस कै छै जैकी, उ मेरू ह्वैगे
वैन अपड़ा नौ की गुन्ठी पैराई जनी
जिकुड़ि म छप-छपी पड़ी तनी
गैल्या डांड्यों कु ज्यू भी हरसैगे
आस कै छै जैकी, उ मेरू ह्वैगे
स्यु ब्यौला बणी सुपन्यौं म आंदू छयो
आंखी खुल्दी त मन झुरांदु छयो
झुराट झुट्टू सुपन्यूं सच्चू ह्वैगे
आस कै छै जैकी, उ मेरू ह्वैगे
बरखिगे मैक विघाता त बिदरा न कै
हाथ जुड़ैै छ, मै से रूसै न जै
बेटुलि कि लाज रखी जनि आज रैगे
आस कै छै जैकी, उ मेरू ह्वैगे