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सुपारीलाल की रामलीला / संजय अलंग

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शरद आते ही प्रतीक्षा शुरू हो जाती
मेरे कस्बे में उत्सुकता छा जाती
लोग एक-दूसरे से पूछने लगते
कब आ रही है सुपारीलाल की रामलीला
 

पूस की चढ़ती ठंड के साथ मण्डली आती
लोग मंच बनते देखते
खिंचते परदों को निहारते
सीमा बनती देखते

कस्बे में हिरण कुलाँचे भरने लगता
सुपारीलाल का हाल पूछा जाता
मण्डली के लोगों को चीन्हा जाता
उन्हे खिलाने को बेताबी मचती
 
साँझ होते ही
युसुफ, तीरथ, ककउआ
सभी चल पड़ते रामलीला को
टाट के बोरे बगल में दबाए
खीसे में मूँगफली भरे
गर्म कपड़ों से लदे-फंदे
 
फुटबाल और फ़ुटबाल के लिए देवेन्द्र के जोश के बाद
कस्बे को खुश और उद्वेलित
सुपारीलाल की राम लीला ही करती


रामलीला की भीड़ कस्बे की सम्पन्नता दर्शाती
बीती अच्छी बारिश और दीपावली की याद दिलाती
सारा कस्बा दौड़ पड़ता
भरा रहना सुपारीलाल की रामलीला का
कस्बे का भी भरा-पूरा रहना था