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सुरभित स्पंदन / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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38
पात थे झरे
उड़े सब पखेरू
एक ही टिका
न छाया की थी चिंता
न था कोई भी फिक्र।
39
लूट लिये थे
सब भौतिक साधन
एक था हीरा
पास में वही बचा
अनुराग से रचा।
40
खोकर पाया
जीवन में जो मैंने
है प्रेमधन
मेरी आद्या है वह
उर का है संगीत
41
जंजाल कटा
छलती गई माया
कुछ न पाया
सूनी थी जब राहें
तब तुमने बाँधा ।
42
छोड़ न जाना
यह जीवन- वन
बहुत क्रूर
तुम बहुत दूर
पर मन में रमे।
43
बन्धन मुक्त
बस एक ही डोर
प्रेम का छोर
वही सिरा पकड़
मन पथिक चला।
44
अपर्णा तुम
एक भरोसा मेरा
साँस -साँस में
तेरा ही है बसेरा
तेरे नैनों का उजेरा।
45
पवन लाए
तेरा ही तो सन्देश
तेरी खुशबू
मन- प्राण -सिंचित
करे है अभिषिक्त
46
पूर्व जन्म का
कौन था शुभकर्म
छू लिया मर्म
सुरभित स्पंदन
उर भी कुसुमित।
47
बँधी है डोर
प्रेम पगे दो छोर
तुम्हारे हाथ
आएँ भले तूफ़ान
रहना सदा साथ।
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