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सुराज ई लियऽ अहाँ / बुद्धिनाथ मिश्र
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किछु मरल माछ सन सपना
दऽ कें तरहथ पर
ओ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।
किछु काँट-कूस
किछु अर्थहीन शब्दक पाथर
दऽ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।
ई केहन व्यूह-रचना क
नाम थिक लोकतंत्र
अभिमन्यु फँसैए आर
हसैए दुर्योधन
वासना इन्द्र केर
शिला भेलि गौतमी नारि
असहाय द्रौपदी नित्य
सहै छथि चीरहरण
भोजन क बेर पुर्जी पर
लिखि कें किछु आखर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ ।
हम सूर्य उगाबय चलल रही
एहि धरती पर
सुरसा क कृपा सँ भेलहुँ
अन्हरिया केँ गुलाम
दऽ प्राण अहाँ भऽ गेलहुँ
अजायबघर क वस्तु
संभव अछि शोभित करी
कोनो सेठ क गोदाम
ओझरा कें ऊनक सभ गोला
सोझरैल हमर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ।