भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सुराज ई लियऽ अहाँ / बुद्धिनाथ मिश्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

किछु मरल माछ सन सपना
दऽ कें तरहथ पर
ओ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।

किछु काँट-कूस
किछु अर्थहीन शब्दक पाथर
दऽ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।

ई केहन व्यूह-रचना क
नाम थिक लोकतंत्र
अभिमन्यु फँसैए आर
हसैए दुर्योधन
वासना इन्द्र केर
शिला भेलि गौतमी नारि
असहाय द्रौपदी नित्य
सहै छथि चीरहरण
भोजन क बेर पुर्जी पर
लिखि कें किछु आखर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ ।

हम सूर्य उगाबय चलल रही
एहि धरती पर
सुरसा क कृपा सँ भेलहुँ
अन्हरिया केँ गुलाम
दऽ प्राण अहाँ भऽ गेलहुँ
अजायबघर क वस्तु
संभव अछि शोभित करी
कोनो सेठ क गोदाम
ओझरा कें ऊनक सभ गोला
सोझरैल हमर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ।