भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सूरज ऊंगत से उठबो / प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सूरज निकर परो पूरब सें,
परे परे तुम अब लौ सो र‌ये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|

ढोर ढील दये हैं दद्दा ने,
और चराबे तुमखों जाने|
चना चबेना गुड़ के संगे,
बांध दओ है बौ अम्मा ने|
अब तो उठ जा मोरे पुतरा,
कक्का बेजा गुस्सा हो रये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|

कलुआ को मोड़ा तो कबको,
बखर हांक कें हारे ले गओ|
बड़े साव की गैया ब्या गई,
उनको मोड़ा तेली दे गओ|
मझले कक्का कबके उठ गये,
कुल्ला करकें गोड़े धो रये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|

कल्लो मल्लो मटका लेकें,
नदिया, पानी भरबे जा रईं|
कतकारीं तो सपर सपर कें,
मिलजुर कें पीपर पुजवा रईं|
फूल धरे हैं टोर टोर कें,
मझले भैया माला गो रये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|

तेलन फुआ तेल दे गईं हैं
और बरोनी काकी भेड़ा|
पंडितजी ने पूजा कर लई,
दे गये चार भोग के पेड़ा|
दोई गधा पुन्नी मम्मा के,
बड़े भोर सें ईंटें ढो रये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|

जल्दी उठबो भौत जरूरी,
कहत रेत हैं जेठे स्याने|
सूरज ऊंगत से उठबो तो,
अच्छो होत स्वास्थ्य के लाने|
आलस करकें काये लल्ला,
तुम अपनी तंदुरुस्ती खो रये|
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये|