भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सूरज भैया / प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अम्मा बोली सूरज भैया जल्दी से उठ जाओ|
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ||

मुर्गे थककर हार गये हैं, कब से चिल्ला चिल्ला|
निकल घोंसलों से गौरैयां, मचा रहीं हैं हल्ला||
तारों ने मुँह फेर लिया है, तुम मुंह धोकर जाओ|
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ||

पूरब के पर्वत की चाहत, तुम्हें गोद में ले लें|
सागर की लहरों की इच्छा, साथ तुम्हारे खेलें||
शीतल पवन कर रहा कत्थक, धूप गीत तुम गाओ|
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ||

सूरज मुखी कह रहा” भैया", अब जल्दी से आएं|
देख आपका सुंदर मुखड़ा, हम भी तो खिल जायें||’
जाओ बेटे जल्दी से जग, के दुख दर्द मिटाओ|
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ||

नौ दो ग्यारह हुआ अंधेरा, कब से डरकर भागा|
तुमसे भय खाकर ही उसने, राज सिंहासन त्यागा||
समर क्षेत्र में जाकर दिन पर, अपना रंग जमाओ|
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ||

अंधियारे से क्यों डरना, कैसा उससे घबराना|
जहां उजाला हुआ तो निश्चित, है उसका हट जाना||
सोलह घोड़ों के रथ चढ़कर, निर्भय हो कर जाओ|
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ||