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सोनल हंस की उड़ान / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

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फूलों की घाटी में
यक्षों के गान हैं
दिन सोनल हंस की उड़ान हैं
 
सुबह :
नाव से उठते
मछुओं का गीत है
शिकनभरे चेहरे का
फागुनी अतीत है
 
बच्चों की आँखों की
भोली मुसकान है
दिन सोनल हंस की उड़ान हैं
 
दोपहरी :
अमराई में लेटी
छाँव है
भुने हुए होलों की
खुशबू के ठाँव है
 
चूड़ी के खनकभरे
पास के मकान हैं
दिन सोनल हंस की उड़ान हैं
 
और शाम :
थकी-हुई चिड़िया का
नीड़ है
सड़कों पर लौट रहे
पाँवों की भीड़ है
 
हरी घास पर सोयी
ओस के निशान
डिब सोनल हंस की उड़ान हैं