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सो गया ओढ़ के फिर शब की क़बाएँ सूरज / शहबाज़ ख्वाज़ा

सो गया ओढ़ के फिर शब की क़बाएँ सूरज
जिन के दामन पे छिड़कता था ज़ियाएँ सूरज

आज तक राख समेटी नहीं जाती अपनी
हम ने चाहा था हथेली पे सजाँए सूरज

आँख बुझ जाए तो इक जेसे हैं सारे मंजर
अपनी बीनाई के दम से हैं घटाएँ सूरज

मेरी पलकों पे लरज़ते हुए आँसू मोती
मेरे बुझते हुए होंटो पे दुआएँ सूरज

ज़िंदगी जिन की हो सहारा की मासफ़त ‘शहबाज’
ऐसे लोगों को कभी रास न आएँ सूरज