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सौंदर्य और प्रेम / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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प्रेयसि, इन प्यासी पलकों में मंदाकिनी प्रवाहित कर दो।
इन निःस्वन जीवन-छिद्रों को अपने सुधा-श्वास से भर दो।
मेरी चंचल रूप-तृषा को ढँक को स्नेहांचल-छाया में;
अमर-लोक की करो प्रतिष्ठा मेरी इस नश्वर काया में।
यह अनिंद्य सौंदर्य! आह, क्या इस पर मर्त्यों का अधिकार?
यह चिर-यौवन! इसे चाहिए अजर प्यार, अमरों का प्यार!

आओ, जग के कुश-काँटों को पारिजात के पुष्प बनावें;
जन्म-मरन की धूप छाँह में चिरशिशु-से खेलें, सुख पावें।
तुम अंतर की रूप-सुधा से मधुर करो त्रिभुवन का जीवन;
मैं प्राणों की प्रेम-ज्योति से जगमग कर दूँ जग का आँगन।
‘अशिव, असुंदर’ की समाधि पर ‘चिरसुंदर, शिव’ का उत्थान!
एक साधना मानवता की!--शत-शत स्वर्गों का निर्माण!!