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स्त्री कविता क्या है? / शैलजा सक्सेना

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स्त्री कविता क्या है?
पूछते हैं वो,
तो खिलखिला कर हँस पड़ती है यह स्त्री!

कहती है:
स्त्री कविता वही है
“जो लिखी है मैंने
अपने मेहनत में दिन-रात जाग कर,
अपनी डिग्रियों से प्राप्त नौकरी के कागज़ों पर!
लिखी हैं मैंने अपनी कवितायें अपने घर की दीवारों पर,
अपने पसीने से बनाये चित्रों में,
और परिवार की मुस्कान में!”

आँसुओं से गीली कविता पढ़ने का समय नहीं है
इस स्त्री के पास!
अपनी दादी-नानियों से लेकर अपने तक
सारे आँसू दे चुकी है वो समुद्र को..
साफ नीले आसमान सी हो गई हैं
उसकी आँखें अब..!

डर के सारे बादलों और
पैर रोकती आँधियों को, चमकती बिजली से
बाँध, रख दिया है उसने
अपनी अलमारी की आखिरी दराज़ में
बहुत पहले!

वह,
अपने रास्ते खुद बनाती
चलती है ऑफिस के कॉरीडोर में
पद-दर-पद!
मीटिंग पर मीटिंग..
नयी योजनायें उसके दिमाग से निकल कर
फैल जाती हैं कागज़ों पर।
पुरुष चकित हो, सहमति में सिर हिलाते हैं!

वह मेहनत की गहरी थकान लिए,
बिस्तर पर गिर,
रचती है नींद के आसमान पर
सुख के तारे,
इसके दौड़ते पाँवों को कौन पुकारे?

वह पाँवों से, बाँहों से, आँखों से,
शरीर के पोर-पोर से,
समूचे अस्तित्व के
नव-रसों से,
रच रही है
अपने लिये
एक नया परिवेश,
एक नयी स्त्री-कविता!