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स्त्री पुरुष / प्रताप सहगल

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उन दोनों के बीच
हमेशा एक सुगन्ध फैली रहती थी
झगड़ा तब
हुआ उन दोनों के बीच
जब उन दोनों के बीच
एक पेड उग आया

वह कहती - बबूल का पेड़ है यह्
वह कहता - यह चिनार है

सारी बहस के बीच में
यही तय करनी था
कि पेड चिनार है या बबूल
इसी बहस में
सुगंध कहीं दूर
अंदर फैले कंगूरों पर टंग गई
और बहस यह साबित करने के लिए होती रही
कि पेड़ चिनार है या बबूल

दोनों पेड़ों की शख़्सियत में
इतना फ़र्क
फिर भी दोनों तुले हुए थे
साबित करने में
कि पेड़ तो वही है
जो उनकी पुतलियों में उतरता है

हार कर पुरुष ने कहा
हो सकता है कि कहीं बबूल भी समाया हो
चिनार की शिराओं में
स्त्री ने अपनी पुतलियों में उतरे
पेड़ की शिराओं में
बबूल ढूंढना शुरु किया
उसे दिखा कि
चिनार की शिराओं में
कहीं उलझी हैं बबूल की शिराएँ
उसने स्वीकार कर लिया
हां शायद बबूल भी
समाया है चिनार की पसलियों के नीचे

नहीं बबूल ही वह
और शायद कहीं
चिनार समा गया है
बबूल की पसलियों में
सारी बहस यहीं आकर स्थगित हो जाती
और चिनार बार-बार अपनी शख्सियत खोजता
बबूल से उलझता रहता

बहस कहीं भी ख़त्म नहीं होती
और क़ंगूरों पर टंगी सुगंध
लौटने की प्रतीक्षा में
अभी वहीं टंगी है
शायद! सूखने का इंतज़ार करती हुई.