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स्पार्ता में / कंस्तांतिन कवाफ़ी / सुरेश सलिल

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वह नहीं जानता था
वह, नरेश क्लिओमेनिस, साहस नहीं जुटा पा रहा था
उसे क़त्तई इल्म नहीं था कि इस तरह की बात माँ[1] से कैसे कहे —
समझौते की गारण्टी के बतौर तोलेमी की शर्त
कि वह भी मिस्र जाए, बन्धक बन कर रहे।...
एक बेहद अपमानजनक और अभद्र बात।

वह कहने-कहने को होता, मगर हिचक जाता हरदम
कहना शुरू करता, मगर ज़बान चिपक जाती तालू से यक्दम ।

मगर वह शानदार औरत बेटे की मुश्किल को भाँप गई
[पहले भी सुन चुकी थी कुछ अफ़वाहें इस बाबत]
और उसने हिम्मत बँधाई उसे, कि बेहिचक कहे ।
और वह हँसी, कहा, बेशक वह जाएगी ख़ुशी-ख़ुशी
कि अपने बुढ़ापे में भी स्पार्ता के काम आएगी।

जहाँ तक अपमान की बात है
क़त्तई असर नहीं हुआ उसका उस पर ।

निश्चय ही लागिद के जैसा एक कल का नवाब
समझ नहीं पाया स्पार्ताई ज़िन्दादिली,
लिहाजा उसकी शर्त अपमानित नहीं कर पाई
उसके जैसी बामर्तबा औरत को —
स्पार्ता के बादशाह की माँ को।

[1928]

शब्दार्थ
  1. स्पार्ता के शासक क्लिओमेनिस तृतीय [235-219 ई०पू०] ने मकदूनिया और अकिअन लीग के विरुद्ध युद्ध में तोलेमी तृतीय से सहायता माँगी। तोलेमी ने शर्त रखी कि क्लिओमेनिस अपने बच्चों और अपनी माँ क्रातिसिकिलिया को बतौर बन्धक सिकन्दरिया भेजे। यह इसलिए अपमानजनक था कि स्पार्ता का शजवंश बहुत प्राचीन- बहुत प्रतिष्ठित था, जबकि तोलेमी राजवंश कुल तीन सौ साल का था। आगे चलकर तोलेमी के यहाँ बन्धक क्रातिसिकिलिया को तोलेमी तृतीय के उत्तराधिकारी ने मार डाला।