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स्वर्णमृग लेने गए थे / महेश अनघ

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स्वर्णमृग लेने गए थे, वीर वंशीधर,
अभी लौटे नहीं हैं ।

दिन गुज़ारे पद्मिनी ने अटकलों में,
स्यात मंडप डल गए हों जंगलों में,
स्यात संगी बँट गए हों दो दलों में,
स्यात कुंडी बज उठे अगले पलों में ।

स्यात अंगुलिमाल के
अवतार से डर कर,
अभी लौटे नहीं हैं ।

इधर पनिहारिन विशारद हो गई है,
नीम की चौपाल संसद हो गई है,
नित नए शृंगार की हद हो गई है,
कामना मन से नदारद हो गई है ।

राजधानी की दिशा में
गए नकबेसर,
अभी लौटे नहीं हैं ।

झाड़ते ही रहो अब राहें मिलन की,
काढ़ कर रख दो भले पुतली नयन की,
दाढ़ पैनी हो गई मारीच-धन की,
बाढ़ कम होगी नहीं सुरसा बदन की ।

भवन की निष्प्राण काया में,
धड़कते घर,
अभी लौटे नहीं हैं ।