भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हज़ार ख़्वाब लिए जी रही हैं सब आँखें / इन्दिरा वर्मा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हज़ार ख़्वाब लिए जी रही हैं सब आँखें
 तेरे बिना हैं मगर मेरी बे-सबब आँखें

 चमकते चाँद सितारो गवाह तुम रहना
 लगी रही हैं फ़लक से तमाम शब आँखें

 तुम्हारे सामने रहती हैं नीम-वा हम-दम
 हया-शनास बहुत हैं ये बा-अदब आँखें

 बस एक दीद की हसरत सजा के पलकों पर
 मिलेंगी तुम से ख़यालों में बे-तलब आँखें

 सिला दिया है मोहब्बत का तुम ने ये कैसा
 मुसर्रतों में भी रोने लगी हैं अब आँखें