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हज़ार नक्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख / सिकंदर अली 'वज्द'

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हज़ार नक्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख
मुझे ने देख दिल-आवेज़ी-ए-ख़याल को देख

गदा-ए-हुस्न तिरा ख़ूगर-ए-सवाल नहीं
निगाह-ए-शौक़ में रानाई-ए-सवाल को देख

नसीम-ए-सुब्ह की अटखेलियों से बरहम है
चमन में फूल के चेहरे पे इश्‍तिआल को देख

ग़ुबार-ए-रिंद है या ख़ाक-ए-साक़ी-ए-महवश
अदब से चूम के हर साग़र-ए-सिफ़ाल को देख

ख़याल-ए-ऐश में भी कैफ़-ए-आरज़ू न रहा
हयात-सोज़ी-ए-ज़हराब-ए-इंफ़िआल को देख

हुजूम-ए-जलवा-बद-अमाँ अदा-ए-ख़ुद-बीनी
निगाह-ए-सब्र से आराइश-ए-जमाल को देख

तमीज़-ए-ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त है षर्त-ए-बे-दारी
ख़याल-ए-अज़मत-ए-माज़ी को छोड़ हाल को देख

रहेगी ‘वज्द’ तिरी काएनात-ए-दिल बरहम
कहा था किस ने कि उस हुस्न-ए-बे-मिसाल को देख