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हत्थी ढिलक गई मेरे चरखे दी / बुल्ले शाह

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हत्थी ढिलक गई मेरे चरखे दी,
मैत्थों कत्तिआ मूल ना जावे।
हुण दिन चढ़िया कद गुज़रे,
मैनूँ रातीं मुँह दिखलावे।
तक्कले नूँ वल पै पै जान्दे,
कौण लौहर लेआवे।
तक्कले तों वल लाह लुहारा,
मैंडा तन्द टुट्ट जावे।
घड़ी घड़ी एह झोले खान्दा,
छल्ली इक्क ना लाहवे।
पतिआँ नहीं जे बीड़ी बन्हां,
बएड़ हत्थ ना आवे।
चमड़िआँ नूँ चोपड़ नाहीं,
माहल पई भिरड़ावे।
तीली नहीं जो पूणी वट्टाँ
पिच्छों वच्छा गोहड़े खावे।
त्रिङण कत्तण कत्तण सइआँ,
बिरहों ढोल वजावे।
माही छिड़ग्या नाल मज्झीं दे,
हुण कत्तण किस ना भावे।
जित्त वल्ल यार उत्ते वल अक्खिआँ,
मेरा रूह उत्तेवल धावे।
गरज़ एह मैनूँ आण मिले,
हुण कौन वसीला जावे।
मैं मणाँ का कत्त ल्या बुल्ला,
जे सहु मैनूँ गल्ल लावे।

शब्दार्थ