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हमने बाबा को देखा है / प्रकाश मनु

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सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है !

कभी चमकती-सी आँखों से
गुपचुप कुछ कहते, बतियाते,
कभी खीजते, कभी झिड़कते
कभी तुनककर गुस्सा खाते ।
कभी घूरकर मोह-प्यार से
घनी उदासी में छिप जाते,
कभी ज़रा-सी किसी बात पर
टप-टप-टप आँसू टपकाते ।
कभी रीझकर चुम्मी लेते
कभी फुदककर आगे आते,
घूम-घूमकर नाच-नाचकर
उछल-उछलकर कविता गाते,
लाठी तक को संग नचाते
सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है !

जर्जर-सी इक कृश-काया वह
लटपट बातें, बिखरी दाढ़ी,
ठेठ किसानी उन बातों में
मिट्टी की है ख़ुशबू गाढ़ी ।
ठेठ किसानी उन क़िस्सों में
नाच रहीं कुछ अटपट यादें,
कालिदास, जयदेव वहाँ हैं
विद्यापति की विलासित रातें ।
एक शरारत-सी है जैसे
उस बुड्ढे की भ्रमित हँसी में,
कुछ ठसका, कुछ नाटक भी है
उस बुड्ढे की चकित हँसी में ।

सोचो उस बुड्ढे के संग-संग,
उसकी उन घुच्ची आँखों से,
हमने कितना कुछ देखा है !

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है !

कहते हैं, अब चले गए हैं
क्या सचमुच ही चले गए वे ?
जा सकते हैं छोड़ कभी वे
सादतपुर की इन गलियों को,
सादतपुर की लटपट ममता
शाक-पात, फूलों-फलियों को ?

तो फिर ठाट बिछा है जो यह
त्यागी के सादा चित्रों का,
और कृषक की ग़ज़लें, या फिर
दर्पण से बढिय़ा मित्रों का ।
विष्णुचंद्र शर्मा जी में जो
कविताई का तंज छिपा है,
युव पीढ़ी की बेचैनी में
जो गुस्सा और रंज छिपा है ।
वह सब क्या है, छलक रहा जो
सादतपुर की इन गलियों में,
मृगछौनों-सा भटक रहा जो
सादतपुर की इन गलियों में।
यह तो सचमुच छंद तुम्हारा
गुस्से वाली चाल तुम्हारी,
यही प्यार की अमिट कलाएँ
बन जाती थीं ढाल तुम्हारी ।
समझ गए हम बाबा, इनमें
एक मीठी ललकार छिपी है,
बेसुध ख़ुद में, भीत जनों की
इक तीखी फटकार छिपी है !

जो भी हो, सच तो इतना है
(बात बढ़ाएँ क्यों हम अपनी !)
सादतपुर के घर-आँगन में
सादतपुर की धूप-हवा में,
सादतपुर के मृदु पानी में
सादतपुर की गुड़धानी में,
सादतपुर के चूल्हे-चक्की
और उदास कुतिया कानी में—
हमने बाबा को देखा है !

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है !

करते हैं अब यही प्रतिज्ञा
भूल नहीं जाएँगे बाबा,
तुमसे मिलने सादतपुर में
हम फिर-फिर आएँगे बाबा,
जो हमसे छूटे हैं, वे स्वर
हम फिर-फिर गाएँगे बाबा ।

स्मृतियों में उमड़-घुमड़कर
आएँगी ही मीठी बातें,
फिर मन को ताज़ा कर देंगी
बड़े प्यार में सीझी बातें !

कई युगों के क़िस्से वे सब
राहुल के, कोसल्यायन के,
सत्यार्थी के संग बिताए
लाहौरी वे दिन पावन-से ।
बड़ी पुरानी उन बातों को
छेड़ेंगे हम, दुहराएँगे,
दुख हमारे, ज़ख़्म हमारे
उन सबमें हँस, खिल जाएँगे ।

तब मन ही मन यही कहेंगे
उनसे जो हैं खड़े परिधि पर,
तुम क्या जानो सादतपुर में
हमने कितना-कुछ देखा है !
काव्य-कला की धूम-धाम का
एक अनोखा युग देखा है ।
कविताई के, और क्राँति के
मक्का-काबा को देखा है!

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है!

हम बाबा के शिष्य लाड़ले
हम बाबा के खूब दुलारे,
बाबा के नाती-पोते हम
बाबा की आँखों के तारे ।
हम बाबा की पुष्पित खेती
हममें ही वे खिलते-मिलते,
हमसे लड़ते और रीझते
हममें ही हँस-हँसकर घुलते ।

हमको वे जो सिखा गए हैं
कविताई के मंत्र अनोखे,
हमको वे जो दिखा गए हैं
पूँजीपति सेठों के धोखे ।
और धार देकर उनको अब
कविताई में हम लाएँगे,
दुश्मन के जो दुर्ग हिला दे
ऐसी लपटें बन जाएँगे ।
खिंची हुई उनसे हम तक ही
लाल अग्नि की-सी रेखा है !
हमने बाबा को देखा है !

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है !