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हम्द / ज़ाहिद अबरोल

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हम्द[1]
रोज़-ए-अज़ल[2] से रोज़-ए-अबद[3] तक इंसाँ की तक़दीर हो तुम
हर तौक़ीर[4] तुम्हारी बख़्शिश[5] इल्म [6]की हर तहरीर[7] हो तुम

सहराओं में पानी हर बूँद तुम्हारी ही ने'मत
और दरिया में डूब रही कश्ती की हर तदबीर[8]हो तुम

बच्चों की मुस्कान बुज़ुर्गों की शफ़क़त[9]भी तुम से है
और जवाँ लोगों के सुनहरे ख़्वाबों की ता’बीर हो तुम

सूरज की सब धूप, धूप में आग तुम्हारे ही दम से
और दरख़्तों के साये में नींद की जू-ए-शीर[10]भी तुम

इंसाँ से इंसाँ का रिश्ता गंग-ओ-जमन[11]से ज़मज़म[12]तक
इस रिश्ते को बाँधने वाली उल्फ़त की ज़ंजीर हो तुम

प्यास से मरने वालों का हर फ़ख़्र-ए-शहादत[13] तुम से है
हक़ की ख़ातिर लड़ने वालों की हर इक शमशीर[14] हो तुम

'ज़ाहिद' इन्सानों ने ये पंछी पिंजरे में ही रक्खा क़ैद
प्यार को जो अल्फ़ाज़ की वुस’अत[15] दे वो आलमगीर[16] हो तुम

शब्दार्थ
  1. ईश्वर स्तुति
  2. अनादि
  3. अनन्त
  4. प्रतिष्ठा
  5. देन, वरदान
  6. ज्ञान
  7. लिखी हुई बात
  8. कोशिश
  9. आशीर्वाद
  10. मीठे पानी की नदी
  11. गंगा और यमुना
  12. मक़्का में एक पवित्र पानी का कुआँ
  13. शहीद होने का गर्व
  14. तलवार
  15. विस्तार
  16. विश्वव्यापी