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हम आँखों से भी अर्ज़-ए-तमन्ना नहीं करते / साग़र निज़ामी

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हम आँखों से भी अर्ज़-ए-तमन्ना नहीं करते ।
मुबहम-सा इशारा भी गवारा नहीं करते ।

हासिल है जिन्हें दौलत-ए-सद-आबला पाई,
वो शिकवा-ए-बे-रंगी-ए-सहरा नहीं करते ।

सद-शुक्र कि दिल में अभी इक क़तरा-ए-ख़ूँ है
हम शिकवा-ए-बे-रंगी-ए-दुनिया नहीं करते ।

मक़्सूद इबादत है फ़क़त दीद नहीं है,
हम पूजते हैं आपको देखा नहीं करते ।

काफ़ी है तिरा नक़्श-ए-क़दम चाहे जहाँ हो,
हम पैरवी-ए-दैर-ओ-कलीसा नहीं करते ।

सज्दा भी है मिनजुमला-ए-अस्बाब-ए-नुमाइश,
जो ख़ुद से गुज़र जाते हैं सज्दा नहीं करते ।

जिन को है तेरी ज़ात से यक-गूना त‍अल्लुक़,
वो तेरे तगाफ़ुल की भी परवा नहीं करते ।

ये लम्हा-ए-हाज़िर तो है कोनैन का हासिल,
हम हाल को नज़्र-ए-ग़म-ए-फ़र्दा नहीं करते ।

हर आग को पहलू में छुपा लेते हैं ’साग़र’
हम तुन्दि-ए-सहबा से भी पिघला नहीं करते ।