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हम जीते तो हैं! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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काली-पील आँधियों वाली-
रेगिस्तानी आषाढ़-साँझ में,
विद्युद्युति से प्रताड़ित,
डाल-लुकी,
अपने ही डैनों में, अंगों में दुबकी
(‘छाँहौ चाहति छाँह’ की याद दिलाती)
किसी चिड़िया की
नन्ही-गोल,
स्तब्ध-भीत,
काठ-मारी
आँख-सा ही-
हमारा अस्तित्व भले ही हो,
पर, हम जीते तो हैं!