हम तो निर्जन के खंडहर हैं।
जीवन का साथी सूनापन,
उदासीनता का आराधन;
प्रिय के अधरों से चिर-बंचित
वंशी के मर्माहत स्वर हैं।
हम तो...
इच्छाओं के बूढ़े विषधर,
हमें समझते हैं अपना घर;
जन्म-मरण के हाथों निर्मित
चल-चित्रों के मध्यांतर हैं।
हम तो...
नभ-चुम्बी प्रासाद रहें ये,
आजीवन आबाद रहें ये;
हम जो कुछ हैं, जैसे भी हैं,
जो भीतर हैं, सो बाहर हैं।
हम तो...