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हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे / रामनरेश पाठक

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हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे।

कीच का क्या रंग, क्या है उत्स कादो का
जेठ की है धूप कैसी मेघ भादो का
ये रहस्य वैसे समय के गात खोलेंगे
हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे

किन वनों, मरू प्रांतरों से हवा क्या लायी
देह जूही नाग तन का मन उड़ा लायी
यह भरम दिक्पंख पर जलजात तौलेंगे
हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे

तुहिन का क्या अर्थ, क्या सन्दर्भ भावी का
इड़ा का क्या गीत है, क्या काव्य रावी का
यह मिथक इतिहास के सहजात ढो लेंगे
हम न बोलेंगे, कमल के पात बोलेंगे।