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हम सब खेल खेलकर हारे / गुलाब खंडेलवाल

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हम सब खेल खेलकर हारे
तन के खेल, खेल कुछ मन के
झूठे थे वे सारे
 
बैठे सतत अहम् के रथ पर
फिरे कीर्ति-वैभव के पथ पर
नित नव संकल्पों के अथ पर
क्या-क्या रूप न धारे!
 
आज कहाँ वे संगी-साथी!
महल-दुमहले, घोड़े-हाथी!
जब हर तरुणी तिलोत्तमा थी
दिन वे कहाँ हमारे!
 
जी करता है आँखें मींचे
सो जाएँ इस तरु के नीचे
कोई अब यह हाथ न खींचे
कोई अब न पुकारे

हम सब खेल खेलकर हारे
तन के खेल, खेल कुछ मन के
झूठे थे वे सारे