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हरि बिनु लगत मोहिं सब सूनो / स्वामी सनातनदेव

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हरि बिनु लगत मोहिं सब सूनो।
जब सों मधुपुरि गये स्याम सखि! बढ़त विरह दिन-दूनो॥
कहा करों नहिं चैन रैन-दिन, नैननि नींद न आवै।
आहट सुनत द्वार लगि देखांे, मनहुँ अबहुँ हरि आवै॥
पै निरास जब फिरहुँ सखी! तो होत हियो अति ऊनो[1]॥1॥
मन में मनहुँ अगिनि-सी सुलगात, निसि दिन विरह जरावै।
ऐसो कोऊ हितू न दीखत, जासों जीय जड़ावै॥
कलपत विलपत ही वय बीतत गुनि-गुनि हरि के गूनो[2]॥2॥
जदपि अनल प्रबल-सी लागत, तदपि न देह जरावै।
जो यह छार होय तनु-तरु तो कछु तो मन सचुपावै॥
जियन न मोहिं सुहाय सखी! अब लगत मरन ही जूनो[3]॥3॥
जो मरि हूँ पाऊँ न प्रानधन तो जरि-मरि का लहिये।
यासों तो यह दुसह दुःख ही जरि-जरि जग में सहिये॥
कब हूँ आय मिलहिं जो प्रीतम तो बढ़िहै रँग दूनो॥4॥
आओ, आओ प्राननाथ! अब जिय की जरनि जुड़ाओ।
विरह-वारिनिधि में बूड़त व्रज, याकों नैंकु बचाओ॥
छाई घोर अमा[4] या व्रज में, मिलै होय पुनि पूनो[5]॥5॥

शब्दार्थ
  1. खासी, खिन्न, उदास
  2. गुण
  3. बड़ा श्रेष्ठ
  4. अमावस्या
  5. पूर्णिमा