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हर बशर इस ज़माने में मेहमान है / रंजना वर्मा

हर बशर इस ज़माने में मेहमान है
किसलिये कर रहा इतना अभिमान है

चार दिन की उमर ले के आया है पर
अपनी फ़ितरत से हर कोई अनजान है

दर्द मिलना यहाँ की रवायत रही
उठ रहा आज क्यूँ दिल में तूफ़ान है

दूसरों के लिये जान भी दें लुटा
कर भला भूल जाना न एहसान है

देश की धूल चन्दन हमेशा लगे
इस तिरंगे की भी क्या गज़ब शान है

यूँ बुलंदी पर कब कौन पहुँचा कभी
जब तलक पाँव नीचे न सोपान है

एक दिन फिर इसी ख़ाक में मिल रहूँ
अब रहा दिल में इतना ही अरमान है