भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हर बे-ज़बाँ को शोला नवा कह लिया करो / क़तील

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हर बेज़ुबाँ को शोला-नवा[1] कह लिया करो
यारो, सुकूत[2] ही को सदा[3] कह लिया करो

ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िन्दगी
हर संगदिल को जाने-वफ़ा कह लिया करो

गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगाने-ख़ास[4]
जितने सनम हैं उनको ख़ुदा कह लिया करो

यारो ये दौर ज़ौफ़-ए-बसारत[5] का दौर है
आँधी उठे तो उसको घटा कह लिया करो

इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत[6] न बढ़ सके
तुम उसको नुक़्स-ए-आब-ओ-हवा[7]कह लिया करो

अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात[8] है
हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा[9] कह लिया करो

दिखलाए जा सकें जो न काँटे ज़ुबान के
तुम दास्तान-ए-कर्ब-ओ-बला[10] कह लिया करो

ले-दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया[11] क़तील
जब दिल जले तो उसको दिया कह लिया करो

शब्दार्थ
  1. जिसकी आवाज़ में आग हो
  2. मौन
  3. आवाज़
  4. विशेष उपासक
  5. दृष्टि की कमज़ोरी
  6. डील-डौल
  7. जलवायु का दोष
  8. मुक्ति का रास्ता
  9. ईश्वरेच्छा
  10. दुखों की कहानी
  11. प्रकाश का चिह्न