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हर माठि में आवाज़ जी ॻौराणि थी मुरिके / एम. कमल

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हर माठि में आवाज़ जी ॻौराणि थी मुरिके।
हर मुरिक में ताज़ी तिखी कौड़ाणि थी मुरिके॥

माहोल में उफ़वाह जी काराणि थी मुरिके।
हर चेहरे में ॾहकाव जी पीलाणि थी मुरिके॥

रतछाण जी गुलकारी महक आगज़नीअ जी।
गुलशन में तबाहीअ जी, छा सुरहाणि थी मुरिके॥

छा चइजे तबाहीअ जो तमाशो ही ॾिसी, बस।
नेणनि जे दरियुनि मां लिकी, आलाणि थी मुरिके॥