भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हवा आ रही है / रमेश तैलंग

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सनन-सन, सनन-सन
हवा आ रही है।
झनन-झन, झनन-झन
हवा जा रही है।

लो, खिड़की के पर्दे
सरकने लगे हैं,
ये दरवाजे खट-खट-
खट बजने लगे हैं,
गवैया है, गुन-गुन
हवा गा रही है।

ये गौरैया चह-चह
चहकने लगी है,
गुलाबों की बस्ती
महकने लगी है,
हवा, ‘मैं हूँ जीवन’,
ये बतला रही है।

सनन-सन, सनन-सन
हवा आ रही है।