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हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह / शाहिदा हसन

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हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह
क़दम उठा रही है रात इक सवार की तरह

फ़सील-ए-वादी-ए-ख़याल से उतर रही है शब
किसी ख़ामोश और उदास आबशार की तरह

तड़प रहा है बारिशों में मेरे जिस्म का शजर
सियाह अब्र में घिरे हुए चिनार की तरह

इन्हीं उदासियों की काएनात में कभी तो मैं
ख़िजाँ को जीत लूँगी मौसम-ए-बहार की तरह

तिरे ख़याल के सफ़र में तेरे साथ मैं भी हूँ
कहीं कहीं किसी ग़ुबार-ए-रह-गुज़र की तरह

उबूर कर सकी न फ़ासलों की गर्दिशों को मैं
बुलंद हो गई ज़मीन कोहसार की तरह

तिरे दिए की रौशनी को ढूँढता है शाम से
मिरा मकाँ किसी लुटे हुए दयार की तरह