भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हवा में कीलें-4 / श्याम बिहारी श्यामल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सलीब चढ़ाकर मुझे
कीलें ठोंक रहा है कोई
मेरे दोनों हाथों को
पैरों को
सटाकर पीछे

मैं चिल्ला भी कैसे सकता हूँ
मेरे होठों पर
साट दिया गया है
इस बार सैलो-टेप

मैंने विरोध किया है
अब भी करूँगा
मैं आकाश को
ज़मीन को
धिक्कारूँगा
मैं मनुष्य को ललकारूँगा

मुझे प्यार है
मेरे गाँव से
मेरी राजधानी से
मैं सवाल उठाऊँगा
कि क्यों पाट दिया गया है
आकाश मेरी राजधानी का
बगूलों से

मुझी से यह जानकर
मेरा सारा गाँव
खो चुका है आँखों की नींद
लोग तैयार हैं
मेरा साथ देने को

मेरी मौत मुझे नहीं मार सकती
मैं मौत को भी
समझा सकता हूँ
सुना सकता हूं
जुल्म की दास्ताँ
मौत भी हमारे साथ होगी
पीछे-पीछे
झण्डा उठाए

यह कोई मामूली बात नहीं कि
तीन सौ खंभों का
पवित्र घर
बना दिया गया
बूचड़खाना
और काबिज़ हो गए हैं
आकाश पर
पंख फैलाए
बग-बग बगुले