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हाँ, इतना तो / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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न गया होऊँ, क्षितिजों के पार-
किन्तु सिहरनों, स्पन्दनों व रोमांचों के
सुदूर-मौन सीमान्तों तक तो
मैं जा कर आया ही हूँ।
न पहुँच होऊँ अतल समुद्रों के तल तक
मोती निकालने!
किन्तु आँखों में उग कर ही रह जाने वाले
(दूज-तीज के चाँद-से, क्षितिज पर आ तुरन्त लौट जाने वाले)
मन के मोतियों की सौदागरी तो मैंने कुछ कम नहीं की है!
न गया होऊँ उत्तुंग शिखरों पर, चाँद पर-
ध्वजारोहण करने!
हाँ, बालक के हाथों से, लापरवाही से
शीघ्र-खिंची-लम्बी लकीर के छोरों-सी-
सूक्ष्म-मौन ऊँचाइयों में तो मैं खोया ही हूँ!
ब्रह्माण्ड के चक्कर तो मैंने नहीं ही लगाये हैं!
किन्तु हाँ, मौन रह कर व्यथा और वेदना के
कौन से तंतु की-
कितनी सीवनें मैंने नहीं उधेड़ी हैं!
विराट् सृष्टि के अणु की सृष्टि का मैं अणु!
कितने पुराण मैं लिख चुका हूँ-
और अभी भी लिखता ही चला जा रहा हूँ!