हाँ, बबूल में जिसने भटे लगाये होंगे-
उसको पहले कभी नहीं मैंने स्वीकारा।
होगा शायद वो गँवार, मसखरा मलंगा,
छेड़छाड़ करता जीवन से लेता पंगा।

बेर, खजूर, करौंदे क्यों न लगाए उसने-
उलझी हुई पहेली सोच-सोचकर हारा।

जीवन के कड़वे सच से होगा बावस्ता,
बदअमनी के मारे होगी हालत ख़स्ता।

भटे बबूलों की तासीरें और विकर्षण-
होगा रहा बाँटता दर-दर वो हरकारा।

अब आये हैं ये अंगूर, संतरे, चीकू।
महज कल्पनासे कैसे रच लेता भीखू?
अब भी लगा रहे हैं लोग बबूलों बेंगन,
ऋषि था जिसने विद्रूपों को यूँ ललकारा।
हाँ, बबूल-बेंगन की स्वीकृति लिए बिना ही
भाषा के घेरे में लाकर इनको मारा।

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