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हादसे क्या-क्या तुम्हारी बेरुख़ी से हो गए / साग़र निज़ामी

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हादसे क्या क्या तुम्हारी बेरुख़ी से हो गए ।
सारी दुनिया के लिए हम अजनबी से हो गए ।

गर्दिशे दौरां[1], ज़माने की नज़र, आँखों की नींद,
कितने दुश्मन एक रस्म-ए-दोस्ती से हो गए ।

कुछ तुम्हारे गेसुओं[2] की बरहमीं[3] ने कर दिया
कुछ अन्धेरे मेरे घर में रोशनी से हो गए ।

यूँ तो हम आगाह[4] थे सैयाद[5] की तदबीर[6] से,
हम असीर[7]-ए-दामे-गुल अपनी खुदी[8] से हो गए ।

हर क़दम ‘सागर’ नज़र आने लगी हैं मंज़िलें
मरहले[9] तय मेरी कुछ आवारगी[10] से हो गए ।

शब्दार्थ
  1. समय का उतार-चढ़ाव
  2. केश
  3. बिखराव
  4. अवगत होना
  5. शिकारी
  6. योजना
  7. बंदी
  8. अहं
  9. मंज़िलें
  10. बिना मकसद के घूमना