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हावड़ा पुल की शाम / शलभ श्रीराम सिंह
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जलयानों ने सौंपा तट को विश्राम !
हुगली की लहरों में
डूब गई शाम !
ट्रामों-कारों-रिक्शों पर बैठा है शहर !
थकी-थकी आँखों के आगे है केवल घर :
बच्चे की सालगिरह (?)
पत्नी की बीमारी (?)
भाई का ब्याह (?)
कहीं जाने की तैयारी (?)
आओ,
ऊपर चलें !
पुल के ऊपर चलें !
ऊपर-ऊपर चलें !
हाँ-हाँ अब घर चलें !
दिशा-दिशा लटक गईं नागिन की केचुलें !
क्षितिजों की खिड़कियाँ शायद कल फिर खुलें !
(1963)