भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हिजाब करें दरवेशी कोलों / बुल्ले शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिजाब[1] करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।
गल अलफी सिरपाए बरैहना,
भलके रूप वटावेंगा।

एह लालच क्या नफसानी[2] मुठों,
कितकों मुंड मुंडाया ई।
घाट ज़कात[3] मंगणगे प्यादे,
कहु क्या अमल कमाया ई।
जद आ बणेगी सिर पर भारी,
उन को क्या बतलावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

जैसी करनी वैसी भरनी,
पिरम नगर वरतार ए।
एत्थे दोज़ख[4] कट्ट तूँ दिलबर,
अग्गे खुल्ल बहाराँ ए।
केसर बीज जो केसर होवे,
लैहसन बीज ठगावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

करो कमाई मेरे भाई,
एहो वकत कमावण दा।
पावण सताराँ हुण पौंदिआँ ने,
फिर दाअ न बाज़ी लावण दा।
उजड़ेगी खेल छपणगिआँ नरदाँ,
झाड़ दुकान उठावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

खावें मास जबावें बीड़ी,
अंग पुशाक लगाया ई।
टेढी पगड़ी आकड़ चलें,
जुत्ती पब्ब अड़ाया ई।
इक दिन अज़ल[5] दा बक्करा हो के,
आपणा आप कुहावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

पढ़ सबक मुहब्बत ओसे दी दा,
किते बमूजब[6] क्यों डुबादा हैं।
पढ़ पढ़ किसे जीओ वलावें,
क्यों खुभणाँ विच्च खुभदा हैं।
हरफ इशक दा इक्को नुक्ता,
कोहे कूँ उट्ठ लदावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

एत्थे गोइल वासा वस्सण नूँ,
रैहण नूँ ओत्थे डेरा है।
लै लै तोहफे घर नूँ घल्लें,
एहो वेला तेरा है।
ओत्थे हत्थ न लगदी ड़ाई,
कुझ ऐत्थों ही लै जावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

कर सौदा पास सौदागर ई,
बिह वेला हत्थ ना आवीगा।
वणज वणोदा नाल शताबी[7],
वणजाराा उð जावीगा।
उस दिन कुझ न हो सकदी,
जद कूच नगारा चलावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

भुक्ख मँगदी नाम अल्ला दे,
एहो बात चँगेरी ए।
दोनों थोक पत्थर थीं भारी,
मुश्कल जेही ढेरी ए।
जे सड़से तूँ इस जग अंदर,
अग्गे सरदी पावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

एह अम्माँ बाबा बेटा बेटी,
पुच्छ वेक्खाँ क्यों रोन्दे ने।
एह रन्नाँ कन्जाँ[8] पुत्तर धीआँ,
विरसे नूँ आन खलोन्दे ने।
एह जो लुट्टण तूँ, क्यों नाहीं,
ज़र के आप लुटावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

इक्कलिआँ ओत्थे जाणा है,
तेरे संग न कोई जावेगा।
खेश[9] कबीला रोन्दा पिट्टदा,
उरिओं ही मुड़ आवेगा।
शहरों बाहर जंगल विच्च वासा,
ओत्थे डेरा पावेगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

जे तूँ मरें मरन से अगे,
एह मरना मुल्ल पावीगा।
मोए सो रोज़ हशर नूँ उट्ठण,
आशक ना मर जावीगा।
मैं वड्डी नसीहत करना हाँ,
जे सुण कर दिल ते लावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

जा राह शरा दा पकड़ेंगा,
ताँ ओट मुहम्मद होवेगी।
दसदी है पर करदी नाहीं,
एहो खलकत रोवेगी।
हुण सुत्याँ कौण जगावे,
जान्देआँ पछतावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

ऐंवे उमर गँवाइआ अवगत[10],
आकबत[11] चा लुड़हाया ई।
चलाकी कर कर दुनिआँ ते,
सुफैदी मूँह ते आया ई।
अजे बेदाद[12] जे ताएब[13] होवें,
तद अशना[14] सदावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

बुल्ला सहू ते चलना ए ताँ,
जान किहा चिर लाया ई।
जगवत के केहे करने,
जाँ वतनों दफतर आया ई।
वाचदिआँ खत अकल गईओ ई,
रो रो हाल वँजावेंगा।

हिजाब करें दरवेशी कोलों,
कब लग हुकम चलावेंगा।

शब्दार्थ
  1. शर्म
  2. विषयी
  3. दान
  4. नरक
  5. मौत
  6. आधारित
  7. जल्दी
  8. बेटियाँ
  9. मुकमल
  10. अकारण, व्यर्थ
  11. आखिर
  12. बेइनसाफी
  13. तोबा करने वाला
  14. महरम