भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हिज्र की शब है और उजाला है / ख़ुमार बाराबंकवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिज्र[1] की शब[2] है और उजाला है
क्या तसव्वुर[3] भी लुटने वाला है

ग़म तो है ऐन ज़िन्दगी लेकिन
ग़मगुसारों ने मार डाला है

इश्क़ मज़बूर-ओ-नामुराद सही
फिर भी ज़ालिम का बोल-बाला है

देख कर बर्क़[4] की परेशानी
आशियाँ[5] ख़ुद ही फूँक डाला है

कितने अश्कों को कितनी आहों को
इक तबस्सुम[6] में उसने ढाला है

तेरी बातों को मैंने ऐ वाइज़[7]
एहतरामन हँसी में टाला है

मौत आए तो दिन फिरें शायद
ज़िन्दगी ने तो मार डाला है

शेर नज़्में शगुफ़्तगी मस्ती
ग़म का जो रूप है निराला है

लग़्ज़िशें[8] मुस्कुराई हैं क्या-क्या
होश ने जब मुझे सँभाला है

दम अँधेरे में घुट रहा है "ख़ुमार"
और चारों तरफ उजाला है

शब्दार्थ
  1. जुदाई
  2. रात
  3. कल्पना
  4. बिजली
  5. घर , आशियाना
  6. मुस्कुराहट
  7. उपदेशक
  8. लड़खड़ाहटें