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हुँकार / अनिरुद्ध प्रसाद विमल

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बाधाओं की संधि रेख पर
उलझा मन कुछ गाता है,
चिन्ता से कुंठित काया को
कौन घेर यह जाता है ?
सम्मुख समुद्र का क्रुद्ध शोर
सोई अलसाई मानवता को
जो होश गवाँ खो बैठी है
दे रहा उसे, यह आमंत्रण।
व्यथित हृदय की पीड़ा को, मिलता है संतोष-स्वाद।
जर्जर जीवन के जड़ को दे रहा, आज कोई है खाद।।
प्रतिकार हेतु उठ रहा आज हूँ, लहरों का यह देख रोष,
पागल हुई जवानी जगती है, लेकर देखो नया जोश।
शोषित होने वालों का, उद्धार तुम्हें करना होगा।
मेरे जर्जर जीवन का, निर्णय तुमको करना होगा।
मैं तो तूफां हूँ, जो कभी भी ऐसे नहीं रूकेगा।
एक खास आदेश हूँ, कभी जो ऐसे नहीं टलेगा।
मैं निज स्वर में घोल रहा, मानव हित सुन्दर गान।
पतझड़ की मुरझाई रंगों में, भरता हूँ नव प्राण।
अय, अतीत से, भीत मनुज-गण
क्यों वर्त्तमान लगता बेकार ?
है भविष्य भरने वाला
निश्चय ही एक नया हुँकार।