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हुये हैं दर्ज़ तवारीख में हम कल बनकर / कृपाशंकर श्रीवास्तव 'विश्वास'

हुये हैं दर्ज तवारीख में हम कल बनकर।
कभी रहे हैं किसी आँख में काजल बनकर।

असर दिखाने लगे सर्द हवा के तेवर,
तुम्हारी याद बरस जाय न बादल बनकर।

मिला है आज मेरी आस को आबो दाना,
वो लौट आया है इन्सान मुकम्मल बनकर।

यकीन था न मुलाकात दुबारा होगी,
मिलेगा कोई मुझे राह में पागल बनकर।

ये बेपनाह मुहब्बत का असर है शायद,
ये शाम आई सवालों के सभी हल बनकर।

पता नहीं था बदल देगी हमारी किस्मत,
ये सर्द रात लिपट जायेगी कम्बल बनकर।

उड़ेगी ख़ाक न गुलशन में यहाँ दोबारा,
रहेगा बाग़ कभी अब न ये जंगल बनकर।

हर एक फिक्ऱ से आज़ाद हुआ है ‘विश्वास’,
महक रहा है बियाबान में सन्दल बनकर।