अगड़ गुम्म गड़-गड़ करत, धका धुम्म करि मेंह;
मदन फौज उनमत्त जनु, गाँसत बिरहिन गेह।
गरजत बरसत झरझरत, गर रर कर गरराहिं;
मधवा बधवा सम खरे, बिरहिन हाड़ चबाहिं।
उमड़ि घुमड़ि बरसत जु नभ, चम चमाय चमकाहिं;
जनु बिरही जन के उदित, पूरब पातक आहिं।
शब्दार्थ
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