भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हेज री सगति / राजेन्द्र शर्मा 'मुसाफिर'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

थांरै होठां रौ परस
म्हारै गालां
अर लिलाड़ माथै
अलेखूं बर हुयौ।

वीं परस सूं
सांचरी सगति
थूं बणा दीन्हौ
म्हंनै बचियै सूं
सांतरौ मिनख
ठा‘ ई नीं लाग्यौ।

अबै ई मिळै नित रा
मीठा परस
होठां सूं होठां
अर गाल माथै।

जांणै गिणती रा
लागै ठापा टिगस माथै
अर कर लेवै इधकार
लिफाफै माथै।

जदई जलमै हूंस
हुय ज्याऊं मुगत
फेरूं लेऊं जलम
अर तिरूं गंगा जैड़ै
थांरै आंचळ हेठै।