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है! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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है, है-
है, कुछ ऐसा है!
मेरे अस्तित्व के मौन-मन्द जलते
माटी-द्वीप की बाती के सिरे पर-
अरुण-नील-हरित सा,
राई के दाने-सा, नन्हा-सा,
सुकुमार-सा,
ज्योति-जीवी-सा, स्नेहपायी-सा,
अँधेरे, मौत और धुँए में-
अनबुझ-सा,
मुझे आलोक, अभय और त्राण देता लगता-सा,
मुझे साँस-साँस साधता-सा,
है,
है, कुछ ऐसा है!

तरंगवती नदियों से भेंटने के क्षणांे में
उच्छ्वसित-उच्छलित
सहस्रबाहु समुद्र के वीर्यवान आह्लाद
की प्राणमयी रागिनी-सा
गंुजायमान;
मेरे स्नायुओं में-
गहन-सा, तहों में भिदा-सा
किसी अमर सुवासित संगीत-सा
कुछ है,
है, कुछ ऐसा है!

जन्मों की डालों पर खिलता मैं-
बार-बार तोड़ कर धूल में
डाल दिया जाता हूँ,
कभी खड़ा कर दिया जाता हूँ फूलदान में शो-पीस-सा,
और फिर फेंक दिया जाता हूँ,
मुर्झा दिया जाता हूँ, कुचल दिया जाता हूँ,
पीस दिया जाता हूँ!
पर, धूलिसात् मेरी पंखुरियों में
कोई जिजीविषामयी हठी मादक गंध-सा
रह जाने वाला
शेष और अमिट फिर भी कुछ है;

है, कुछ ऐसा है!