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हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे / साग़र निज़ामी

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हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे ।
तुम ने बना दिया है मुहब्बत में क्या मुझे ।

हर मंज़िल-ए-हयात से गुम कर गया मुझे ।
मुड़-मुड़ के राह में वो तेरा देखना मुझे ।

कैफ़-ए-ख़ुदी ने मौज को कश्ती बना दिया,
होश-ए-ख़ुदा है अब ना ग़म-ए-नाख़ुदा मुझे ।

साक़ी बने हुए हैं वो `साग़र' शब-ए-विसाल,
इस वक़्त कोई मेरी क़सम देखता मुझे ।