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होत ही प्रात जो घात करै नित / ब्रज चन्द्र

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होत ही प्रात जो घात करै नित पारै परोसिन सोँ कल गाढ़ी ।
हाथ नचावत मुँड खुजावत पौर खड़ी रिस कोटिक बाढ़ी ।
ऐसी बनी नख ते सिख लौँ ब्रजचन्दजू क्रोध समुद्र ते काढ़ी ।
ईँटा लिये पिय को मग जोवति भूत सी भामिनि भौन मे ठाढ़ी ।


ब्रज चन्द्र का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।