भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

होना न होने की तरह / अशोक कुमार पाण्डेय

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

(एक)
जूतों को माप भले हो जाये एक सी
पिता के चश्मों का नम्बर अमूमन अलग होता है पुत्र से

जब उन्हें दूर की चीजें नहीं दिखती थी साफ़
बिल्कुल चौकस थी मेरी आँखें
जब मुझे दूर के दृश्य लगने लगे धुधंले
उन्हें क़रीब की चीजों में भी धब्बे दिखाई लेने लगे

और हम दृश्य के अदृश्य में रह एक-दूसरे के बरअक्स

(दो)
उनके जाने के बाद अब लगता है कि कभी उतने मज़बूत थे ही नहीं पिता
जितना लगते रहे । याद करता हूँ तो मंहगे कपड़े का थान थामे ब्रांड के नाम
पर लूट पर भाषण देता उनका जो चेहरा याद आता है उस पर भारी दागदार
तीस रूप्ये मीटर वाली कमीज़ लिए लौटता खिचड़ी बालों वाला दागदार
उदास चेहरा। स्मृतियों की चौखट पर आकर जम जाती है सुबह-सुबह
स्कूटर झुकाए संशयग्रस्त गृहस्थ की आँखों के नीचे उभरती कालिख

जैसे पृथ्वी थक-हार कर टिकती होगी कछुए के पीठ पर पिता की गलती
देह पर टिक जाता है वह स्कूटर

(तीन)
हम स्टेफी से प्यार करते थे और नवरातिलोवा के हारने की मनौती माँगते थे
काली माई से । भारतीय टीम सिर्फ इसलिए नहीं थी दुलारी कि हम भारतीय थे।
मोटरसाइकल पर बैठते ही एक राजा श्रद्धेय फकीर में बदल गया।
त्रासदियाँ हमें राहत देती रहीं पुरूषत्व के सद्यप्राप्त दंश से। हम जितने
शक्तिशाली हुए उतने ही मुखलिफ़ हुए।

हमारे प्रेम के लिए पिता को दयनीय होने की प्रतीक्षा करनी पड़ी।

(चार)
इसकी देह पर उम्र के दाग हैं । इसकी समृतियों में दर्ज है सन
बयासी....चौरासी..... इक्यानवे के बाद ख़ामोश हो गया यह और फिर इस
सदी में उसका आना न आने की तरह था होना न होने की तरह।

घर में रखा फिलिप्स का यह पुराना ट्रांजिस्टर देख कर पिता का चेहरा याद
आता है ।

(पाँच)

भीतर उतर रहा नाद निराला ।

दियारे की पगडंडियों पर चलता यह मैं हूँ उंगलियाँ थामे पिता को देखता
अवाक गन्ने के खेतों की तरह शान्त सरसराती आवाज़ में कविताओं से
गूँजते उन्हें । आँखें रोहू मछली की तरह मासूम और जेठ की धूप में चमकते
बालू-सी चमकती पसीने की बूँदों के बीच यह कोई और मनुष्य था।
सबसे सुन्दर - सबसे शान्त - सबसे प्रिय - सबसे आश्वस्तिकारक।

वही नदी है। वही तट। निराला नहीं हैं न वह आवाज़ । बासी मन्त्र गूँज रहें हैं
और सुन रही है पिता की देह शान्त ....सिर्फ शान्त।

मेरे हाथों में उनके लिए कोई आशवस्ति नहीं अग्नि है

(छः)

यह एक शाम का दृश्य है जब एक आधा बूढ़ा आदमी एक आधे जवान लड़के को पीट रहा है अधबने घर के दालान में
यह समय आकाशगंगा में गंगा के आकार का है प्रकाश वर्ष में वर्ष जितना
और प्रलय में लय जितना। दो जोड़ी आँखें जिनमें बराबर का क्षोभ और
क्रोध भरा है । दो जोड़ी थके हाथ प्रहार और बचाव में तत्पर बराबर। यह
भूकम्प के बाद की पृथ्वी है बाढ़ के बाद की नदी चक्रवात के बाद का
आकाश।

और......

एक शाम यह है कुहरे और ओस में डूबी । एक देह की अगिन मिल रही है
अग्नि से वायु, जल, आकाश अपने-अपने घरों में लौट रहे हैं नतशिर ।
अकेली हैं एक जोड़ी आँखें बादल जितने जल से भरी ।
उपमाएँ धुएँ की तरह बहुत ऊपर जाकर नष्ट हाती हुई शून्य के आकार में ।

(सात)
कुछ नहीं गया साथ में

गंध रह गयी लगाए फूलों में स्वाद रह गया रोपे फलों में। शब्द रह गये
ब्रह्मांड में ही नहीं हम सबमें भी कितने सारे। मान रह गए अपमान भी।
स्मृतियाँ तो रह ही जाती है विस्मृतियाँ भी रह गयी यहीं। रह गयी किताबें
अपराध रह गए किए-अनकिए। कामनाएँ न जाने कितनी।

जाने को बस देह गयी जिस पर सारी दुनिया के घावों के निशान थे
और एक स्त्री के प्रेम के।