भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

...तो जानूँ / जानकीवल्लभ शास्त्री

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी शब्दों के अर्थ उपलब्ध हैं। शब्द पर डबल क्लिक करें। अन्य शब्दों पर कार्य जारी है।

तीखे काँटों को
फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ।

वीरान ज़िन्दगी की ख़ातिर
कोई न कभी मरता होगा,
तपती सांसों के लिए नहीं
यौवन-मरु तप करता होगा,
फैली-फैली यह रेत।
ज़िन्दगी है या निर्मल उज्ज्वलता?
निर्जल उज्ज्वलता को जलधर,
जलधार बना दो तॊ जानूँ।

मैं छाँह-छाँह चलता आया
अकलुष प्रकाश की आशा में,
गुमसुम-गुमसुम जलता आया :
उजलूँ तो लौ की भाषा में।
औंधा आकाश टँगा सर पर,
डाला पड़ाव सन्नाटे ने,
ठहरे गहरे सन्नाटे को
झंँकार बना दो तो जानूँ।