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104 / हीर / वारिस शाह

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मलकी आखदी लड़यों ना नाल चूचक कोई सुखन[1] न जीउ ते लावना ई
केहा मापियां पुतरां लड़न हुंदा तुसां खटना ते असां खावना ई
छिड़ माल दे नाल मैं घोल घती रातीं सांभ मझीं घरीं आवना ई
तूं ही चोय के दुध जमावना ईं तूं ही हीर दा पलंघ वछावना ई
कुड़ी कल दी तेरे तों रूस बैठी तूं ही उस नूं आ मनावना ई
मंगू माल ते हीर सयाल तेरी नाले घूरना ते नाले खावना ई
तेरे नाम तों हीर कुरबान कीती मंगू सांभ के चार लयावना ई

शब्दार्थ
  1. मेहणा, ताना