भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

111 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सिर बेटियां दे चा जुदा करदे जदों गुस्सयां ते बाप आंवदे नी
सिर वढके नदी विच रोहड़ दें दे मास कां कुते बिले खांवदे नी
समी जान जलाली ने रोहड़ दिती कई डूम[1] ढाडी पए गांवदे नी
औलाद जेहड़ी आखे ना लगे मापे उसनूं मार मुकांवदे नी
जदों कहर ते आंवदे बाप जालम बन्ह बेटियां भोरे पांवदे नी
वारस शाह जे मारिये बदां तांई देवे खून ना तिन्हां दे आवंदे नी

शब्दार्थ
  1. एक जात