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114 / हीर / वारिस शाह

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सुलतान भाई आया हीर संदा आखे मां नूं घिऊ नूं ताड़ अम्मां
असां फेर जे बाहर एह डिठीसुटां एसनूं जान थीं मार अम्मां
तेरे आखयां सतर[1] जे ना बैठी फेरां एसदी धौन तलवार अम्मां
चाक वड़े नाहीं साडे विच बेहड़े नहीं डकरे करांगे चार अम्मां
जेकर धी ना हुकम विच रखियाई सभ साड़ सुटां घर बाहर अम्मां
वारस शाह जेकर धी बुरी होवे रोहड़ दे समुंदरों पार अम्मां

शब्दार्थ
  1. परदा