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116 / हीर / वारिस शाह

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काज़ी आखदा खौफ खुदाई दा कर मापे जिद चढ़े चा मारनी गे
तेरी किआड़ीयों[1] जीभ कढा सुट्टण मारे शरम दे खून गुजारनी गे
जिस वकत दिता असां चा फतवा उस वकत ही मार उतारनी गे
वारस शाह कउं तरक[2] बुरयाइया नूं नहीं अग दे विच निधारनो गे

शब्दार्थ
  1. तालू से
  2. त्याग