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121 / हीर / वारिस शाह

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रांझे आखया आउ खां बैठ हीरे कोई खूब तदबीर बनाइए नी
माओं बाप तेरे दिलगीर हुंदे किवें ओहनां ते बात छपाइए नी
मिठी नायन नूं सद के गल कीजे जे तूं कहें तेरे घर आइए नी
मैं सयालां दे वेहड़े वड़ां नाहीं मैथों हीर नूं नित पुचाइए नी
दिने रात तेरे घर मेल साडा साडे सिर अहिसान चढ़ाइए नी
हीर पंज मोहरां हथ दितियां नी किवें मिठीए डौल बणाइए नी
कुड़ीयां पास ना खोहलणा भेत मूले गल जीउ दे विच लुकाइए नी
वारस शाह छुपाइए खलक[1] कोलों भावें आपणा ही गुड़ खाइए नी

शब्दार्थ
  1. संसार, सभी प्राणी